कोरबा।
कानून की किताबों में लिखा है कि कानून सबके लिए बराबर होता है। लेकिन जमीन पर कई बार ऐसे दृश्य सामने आ जाते हैं जो इस सिद्धांत पर ही सवाल खड़े कर देते हैं। कोरबा में घटी ताजा घटना भी कुछ ऐसी ही कहानी बयान कर रही है, जहां आरोप सत्ता के प्रभाव के आगे कानून की मजबूरी की ओर इशारा कर रहे हैं।
मामला पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर के बेटे संदीप कंवर से जुड़ा है। आरोप है कि शराब के नशे में उनकी कार पुराना बस स्टैंड के पास सड़क किनारे लगी एक सेवई की दुकान से जा टकराई। दुकान को नुकसान हुआ और जब बुजुर्ग दुकानदार अजीम कुरैशी ने विरोध किया, तो उन्हें समझाने के बजाय मारपीट का सामना करना पड़ा।
सूचना मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची और संदीप कंवर को कार सहित कोतवाली थाना ले जाया गया। लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है। बताया जा रहा है कि थाने में भी उनका व्यवहार आक्रामक ही रहा और गाली-गलौच तक की नौबत आ गई।
प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि कुछ देर बाद उनके समर्थक थाने पहुंच गए और संदीप कंवर को कार में बैठाकर वहां से लेकर चले गए। सबसे हैरानी की बात यह रही कि यह सब पुलिस की मौजूदगी में हुआ और अधिकारी मूकदर्शक बने रहे।
अब सवाल यह उठता है कि अगर यही घटना किसी आम नागरिक के साथ जुड़ी होती, तो क्या नतीजा भी यही होता? शायद नहीं। तब शायद कानून की धाराएं तेजी से चलतीं, गिरफ्तारी भी होती और कड़ी कार्रवाई की बात भी सामने आती।
कोरबा की यह घटना सिर्फ एक विवाद नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जो बराबरी के सिद्धांत पर चलने का दावा करती है। अब नजर इस बात पर है कि पुलिस प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष कार्रवाई कर जनता का भरोसा कायम रखता है या फिर यह मामला भी सत्ता और प्रभाव की परछाई में दबकर रह जाएगा।
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