कोरबा/पाली:- जिले में चिकित्सा प्रतिपूर्ति के नाम पर बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया। यह घपलेबाजी दो विभागों के मिलीभगत से हुई है। जिसमे स्वास्थ्य व शिक्षा विभाग शामिल है। इन विभागों के अधिकारियों ने फर्जी मनगढ़ंत बिल बनाकर भुगतान के लिए फाइल कोषागार में भेज दी, जहां से 1.71 लाख का फर्जी भुगतान भी हो गया। यह भ्रष्ट्राचार का मामला तब उजागर हुआ जब एक आरटीआई कार्यकर्ता ने सूचना के अधिकार से संबंधित दस्तावेज हासिल कर ली। जिसकी शिकायत कलेक्टर सहित मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री, शिक्षा- स्वास्थ्य मंत्री व संभागायुक्त से करने के बाद मामले में जिम्मेदार वर्ग मिलकर लीपापोती के प्रयास में लगे है।
चिकित्सा प्रतिपूर्ति में फर्जीवाड़ा का यह मामला पाली विकासखण्ड के शासकीय हाईस्कूल बकसाही में पदस्थ व्याख्याता सुभाषचंद्र गुप्ता और इनकी पत्नी श्रीमती संतोषनी गुप्ता व पुत्री अनुष्का गुप्ता के बीमारी से जुड़ा है। जिसमे गंभीर बीमारी का हवाला देकर सुनियोजित तरीके से दवाइयों का फर्जी बिल प्रस्तुत कर 1 लाख 71 हजार 465 रुपए का अनुचित लाभ ले लिया। उक्त व्याख्याता व उनकी पत्नी, पुत्री के बीमारी के उपचार में डॉक्टर ने जो दवाइयां उपयोग के रूप में लिखी है उनमें मैनफोर्स, वियाग्रा, कोलगेट सेंसिटिव टूथपेस्ट, डॉबर पुदीन हरा एक्टिव, सत इसबगोल, ईनो लेमन, केरला सेंडल ट्रायो क्लास, डॉबर त्रिफला चूर्ण, नवरत्न एक्टिव डियो कूल, गुडनाईट गोल्ड फ्रेश, पॉन्ड्स सैंडल टॉल्क, नायसिल कूल सेंडल पावडर, व्हाइट टोन फेस पावडर, डॉबर गुलाबरी गुलाब जल, मार्टिन रिफिल, हिमालय कंप्लीट केयर, जेरिना क्रीम, पॉन्ड्स ड्रीम फ्लावर टॉल्क जैसे मर्दाना दवाई और सौंदर्य प्रसाधन शामिल है। इस फर्जीवाड़ा का खुलासा आरटीआई कार्यकर्ता विजय (बादल) दुबे द्वारा सूचना का अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों से हुआ है। जिसमें पाया गया कि व्याख्याता सुभाषचन्द्र गुप्ता द्वारा स्वयं व अपनी पत्नी- पुत्री के गंभीर बीमारी के उपचार से संबंधित चिकित्सा प्रतिपूर्ति का जो बिल पेश किया उसे बगैर जांच परख के शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने प्रमाणित कर कोषागार को भेज दिया और जहां से व्याख्याता के खाते में 1.71 लाख का भुगतान भी हो गया। इस कूटरचित मामले में गंभीर बात तो यह है कि व्याख्याता सुभाषचन्द्र गुप्ता ने बिलासपुर स्थित सुप्रसिद्ध अपोलो हॉस्पिटल से इलाज कराने का दावा किया है और जहां दवाइयों के रूप में जो मर्दाना दवाई व सौंदर्य सामाग्री लिखी गई है उस हॉस्पिटल मेडिकल बिल में डॉ. विजय कुमार श्रीवास का नाम अंकित है, जिनके देखरेख में पूरा उपचार होना बताया गया है। अब इस पूरे मामले में आवश्यक जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा कि प्रस्तुत मेडिकल बिल में जिस हॉस्पिटल से उपचार का उल्लेख है, वास्तव में उसकी सच्चाई क्या है। बहरहाल आरटीआई कार्यकर्ता विजय दुबे द्वारा इस घपलेबाजी मामले को लेकर बीते 11 अक्टूबर को मयदस्तावेज शिकायत कलेक्टर को प्रेषित कर निष्पक्ष जांच और उचित कार्रवाई की मांग की गई है, साथ ही जिसकी प्रतिलिपि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सहित उप मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य- शिक्षामंत्री, बिलासपुर संभागायुक्त को भेजी गई है। जिस शिकायत के बाद फर्जी चिकित्सा प्रतिपूर्ति भुगतान में संलिप्त शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के सिर पर हवाइयां उड़ने लगी है और वे मामले की लीपापोती में जुट गए है। आरटीआई कार्यकर्ता व शिकायतकर्ता बादल दुबे का आरोप है कि इस भ्रष्ट्राचारित खेल में शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पाली के प्राचार्य मनोज सराफ, जिला शिक्षाधिकारी तामेश्वर प्रसाद उपाध्याय और मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी सूर्यनारायण केसरी व कोषागार अधिकारी की मिलीभगत है। इस मामले की शिकायत पर अबतक कोई कार्रवाई सामने नही आ पायी है। बादल दुबे ने शासन- प्रशासन स्तर पर इस भ्रष्ट्राचार मामले में कार्रवाई नही होने पर उच्चतम न्यायालय की शरण मे जाने की बात कही है।
ज्ञात हो कि इसी तरह का फर्जी मेडिकल रीइंबर्समेंट का मामला बिलासपुर जिले के बिल्हा ब्लाक अंतर्गत पौंसरा संकुल समन्वयक व शिक्षक नेता साधेलाल पटेल और उनकी शिक्षिका पत्नी राजकुमारी पटेल का बीते माह उजागर हुआ था। जिसमे पति- पत्नी ने मिलकर फर्जी मेडिकल बिल के माध्यम से 7.50 लाख रुपए की हेराफेरी की थी। मामला सामने आने के बाद त्वरित जांच पश्चात दोनों पति- पत्नी को शिक्षा विभाग ने सस्पेंड कर दिया, साथ ही जेडी ने इस फर्जीवाड़े मामले में एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश भी दिए। जिसके तहत शिक्षक साधेलाल और उनकी शिक्षिका पत्नी राजकुमारी के खिलाफ थाने में गड़बड़ी संबंधित जांच रिपोर्ट और दस्तावेज देकर उन पर कूटरचना, धोखाधड़ी, हेराफेरी का अपराध भी दर्ज कराया गया। जबकि ऐसा ही मामला कोरबा जिले में शिकायत के माध्यम से सामने आने के बाद भी कार्रवाई को लेकर प्रशासनिक तौर पर लेटलतीफी और इस घपलेबाजी से जुड़े लोगों को क्लीनचिट दिया जाना समझ से परे है। जो सिस्टम पर अनेको सवाल खड़े करता है।






















