रिपोर्टर गौतम कुमार राज
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कोरबा/पाली:- भले ही सरकार महंगे समर्थन मूल्य पर धान खरीदी कर और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत निशुल्क रूप से गरीबों को खाद्यान्न उपलब्ध करा रही हो। लेकिन चांवल बनाने वाले मिलर्स गुणवत्ता परखने वाले जिम्मेदारों से सांठगांठ कर गुणवत्ताहीन चावल सरकारी गोदाम में पहुँचा रहे है। जहां से शासकीय उचित मूल्य दुकानदारों को सौंपा जा रहा है और गरीबों के हिस्से में गुणवत्ताहीन भुरभुरे, टूटे, गंदे चावल जा रहे है। इसमें पीडीएस दुकानदार भी नागरिक आपूर्ति निगम से होने वाली आपूर्ति का रोना रोकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ ले रहे है।
आदिवासी बाहुल्य विकासखण्ड पाली में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत बेहद घटिया क्वालिटी का चावल राशन दुकानों को सप्लाई हो रहा है। दरअसल चावल बनाने वाले मिलर्स गुणवत्ताहीन चावल सरकारी गोदाम में पहुँचा रहे है। पाली के ग्राम सैला में बना एफएफसी गोदाम में अनुबंधित कटघोरा क्षेत्र के राइस मिलर्स से भेजा जा रहा चावल बिना देखरेख के पीडीएस को आपूर्ति किया जा रहा है। यह सिलसिला वर्तमान का ही नही बल्कि पिछले 2- 3 माह से घटिया चावल गरीब उपभोक्ताओं को दिया जा रहा है। जिसमे शासन के निर्धारित मापदंड की खुलेआम अनदेखी कर टूटे हुए चावल की मात्रा अधिक, कंकड़, पत्थर वाला और पालिस की कमी के कारण चावल भुरभुरे व बेहद घटिया दिख रहा है, जो खाने योग्य नही बनती। जिसे अंत्योदय, मिड डे मिल, बीपीएल, एपीएल योजना के तहत दिया जा रहा है। घटिया चावल को लेकर ग्रामीणों का कहना है कि यह चावल न सिर्फ खाने योग्य नही है, बल्कि जनस्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन सकता है। ऐसे में आरोप लग रहा है कि इसमें राइस मिलर्स, क्वालिटी इंस्पेक्टर, गोदाम प्रभारी और नागरिक आपूर्ति निगम के अधिकारियों की मिलीभगत है। जिसके फलस्वरूप निम्न गुणवत्ता का चावल आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों में भेजा जा रहा है। जहां के ग्रामीण अपनी आवाज बुलंद नही कर पाते। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि भोले- भाले आदिवासी परिवारों की चुप्पी का फायदा उठाकर उन्हें निम्न दर्जे का खाद्यान्न दिया जा रहा है।

गौरतलब है कि शासन समर्थन मूल्य पर खरीदी गई मोटी किस्म की धान अनुबंधित मिलर्स को चावल बनाने के लिए उपलब्ध कराती है। एक किलो चावल बनाने में सरकार 20 से 25 रुपए खर्च करती है। तब चावल नागरिक आपूर्ति निगम को पीडीएस में वितरण के लिए जाता है। मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी मार्केटिंग फेडरेशन और नागरिक आपूर्ति निगम की होती है। आशंका जताई जा रही है कि मिलर्स अच्छी गुणवत्ता का धान शासन से लेकर उसे खुले बाजार में बेच देते है और घटिया क्वालिटी की कनकी (चावल) खरीदकर उसे पीडीएस सिस्टम को भेज दी जाती है। जबकि शासन के आदेशानुसार चावल में कनकी नही होना चाहिए,, खंडा की मात्रा 25 प्रतिशत ही होनी चाहिए। लेकिन यहां तो ज्यादातर टूटा हुआ कम पालिस किया गया कंकड़, पत्थर मिला घटिया चावल गरीब उपभोक्ताओं के हिस्से में जा रहा है। नियम के मुताबित चावल आपूर्ति कराने से पहले उसकी गुणवत्ता की जांच करानी आवश्यक है। पर अत्यंत ही निम्न स्तर के चावल को पास करने का सर्टिफिकेट प्रदान कर दिया जा रहा है। गरीबों को यह चावल मुख्यमंत्री खाद्यान्न योजना के तहत निशुल्क रूप से वितरित हो रहा है, इस वजह से वे चावल की गुणवत्ता में कमी के बाद भी चुप बैठ जाते है। जागरूक पीडीएस उपभोक्ताओं ने शासन- प्रशासन से मांग की है कि इस पूरे मामले में निष्पक्ष जांच कराकर और दोषियों पर कठोर कार्रवाई की जाए। साथ ही भविष्य में गुणवत्तापरख खाद्यान्न की समय पर आपूर्ति, आदिवासी क्षेत्रों में विशेष निगरानी रखा जाए, पीडीएस व्यवस्था की कार्यप्रणाली को पारदर्शिता बनाने मांग की गई है। देखना है कि प्रशासन इस मामले पर कितनी गंभीरता से कदम उठाता है






