कोरबा/उरगा।
पत्रकारिता जैसे पवित्र पेशे को बदनाम करने वाले कुछ कथित पत्रकारों की करतूतें अब खुलेआम सामने आने लगी हैं। उरगा थाना क्षेत्र के ग्राम चिकनिपाली में रविवार शाम उस वक्त हड़कंप मच गया जब कोरबा से पहुंचे तीन कथित पत्रकारों ने एक किसान को डराने-धमकाने की कोशिश की — और आखिरकार ग्रामीणों के गुस्से का शिकार हो गए।
सूत्रों के अनुसार, मौके पर पहुंचे कथित पत्रकारों में राजकुमार दुबे, अरशद लारी और एक महिला शामिल थी। आरोप है कि इन्होंने किसान के घर में रखे धान को “अवैध” बताकर पहले तो पैसे की मांग की, और जब किसान ने पैसे देने से इनकार किया तो धान जब्त कराने और प्रशासनिक कार्रवाई की धमकी देने लगे।
फर्जी पहचान, फर्जी रौब
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि राजकुमार दुबे ने खुद को भारतीय खाद्य निगम (FCI), भारत सरकार का सदस्य बताया। सवाल यह है कि —
अगर वे FCI के सदस्य हैं, तो पत्रकार बनकर किसानों के घर क्यों घूम रहे हैं?
और अगर पत्रकार हैं, तो FCI का फर्जी परिचय क्यों?
ग्रामीणों की सूचना पर नायब तहसीलदार को बुलाकर जांच करवाई गई, जिसमें साफ तौर पर यह प्रमाणित हुआ कि किसान का धान पूरी तरह वैध है। यानी कथित पत्रकारों की पूरी कहानी झूठ और दबाव बनाने की साजिश निकली।
पहले भी लग चुके हैं उगाही के आरोप
सूत्रों के मुताबिक, राजकुमार दुबे के खिलाफ अवैध उगाही की कई पुरानी शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं। यहां तक कि वे जेल की हवा भी खा चुके हैं। इसके बावजूद, न तो उनकी गतिविधियों पर लगाम लगी और न ही प्रशासन ने सख्ती दिखाई।
कभी क्लिनिक, कभी धान केंद्र — ये हैं या सर्वगुणसंपन्न अफसर?
हाल ही में अमलीभांठा में प्रदीप कश्यप के घर पहुंचकर कथित तौर पर बिना डिग्री के क्लिनिक चलाने का आरोप लगाते हुए ₹1 लाख की मांग की गई। इस मामले की शिकायत एसपी कार्यालय में दर्ज कराई गई।
इतना ही नहीं, 25 दिसंबर को पंतोरा धान खरीदी केंद्र से एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें राजकुमार दुबे खुद को फिर से FCI का सदस्य बताकर जांच करते और किसानों व कर्मचारियों से बहसबाजी करते नजर आए।
सबसे बड़ा सवाल – प्रशासन कब जागेगा?
अब सवाल यह नहीं कि ये लोग क्या कर रहे हैं,
सवाल यह है कि प्रशासन अब तक चुप क्यों है?
क्या कोई व्यक्ति खुद को कभी FCI अधिकारी, कभी पत्रकार, कभी जांचकर्ता बताकर खुलेआम वसूली कर सकता है?
क्या असली पत्रकारिता की साख को यूं ही गिरवी रख दिया जाएगा?
और कब तक किसान, व्यापारी और आम लोग ऐसे फर्जी पत्रकारों के आतंक का शिकार होते रहेंगे?
👉 अब जरूरत है निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की, ताकि पत्रकारिता की आड़ में चल रही उगाही की दुकान हमेशा के लिए बंद हो सके।
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