कोरबा/पाली:- एक ओर पाली उप वनमंडल व वन परिक्षेत्र के अधिकारी कार्यालय के वातानुकुलित कक्ष में बैठकर अपने कर्तव्यों की इश्रीति कर रहे हैं, तो दूसरी ओर फील्ड पर रहने वाले वन कर्मचारियों के शह पर ग्रामीण वन विभाग की आरक्षित बेशकीमती जमीन को टुकड़ों में बांटकर दुकान- मकान निर्माण में मस्त हैं। धौराभांठा में मुख्यमार्ग किनारे वनभूमि पर अवैध कब्जा कर झोपड़ीनुमा दुकाने, बाद में पक्का मकाने निर्माण होना पाली वन अमला के मौन सहमतिका एक उदाहरण है।
पाली- दीपका मुख्यमार्ग पर ग्राम धौराभांठा में वनभूमि पर कब्जा कर दुकान- मकान निर्माण कार्य बेखौफ चल रहा है। यहां वन विभाग की आरक्षित कई एकड़ बेशकीमती भूमि को ग्रामीणों द्वारा टुकड़ों में बांट लिया गया है और जहां मुख्यमार्ग किनारे आधा दर्जन से अधिक झोपड़ीनुमा दुकान का संचालन हो रहा है तो इसके पीछे पक्का मकान निर्माण कार्य द्रुत गति से जारी है। बताया जा रहा है कि पहले बांस- बल्ली की दुकानें फिर बाद में पक्का मकाने तैयार करने की नीति पर काम चल रहा है। कुछ साल बाद कब्जा पुराना है कहकर पट्टे की मांग करेंगे। धौराभांठा में पेड़ों के बीच उभरती दीवारें इस बात का सबूत है कि वन संरक्षण के नाम पर यहां क्या खेल चल रहा है। सूत्रों के मुताबित वन विभाग के डिप्टी से लेकर बीट स्तर के नौकरशाहों द्वारा अवैध कब्जाधारी ग्रामीणों से सांठगांठ कर उन्हें निर्माण की खुली छूट दे दी गई है। जिसके परिणामस्वरुप धौराभांठा में वनभूमि पर अवैध कब्जा और निर्माण की होड़ मची है। बीते दिनों इस अवैध कब्जे व निर्माण को लेकर “वनभूमि पर बस रहा नया नकटी : पाली के धौराभांठा में मुख्यमार्ग किनारे ग्रामीणों ने बांट ली जमीन! पहले झोपड़ी, फिर पक्का मकान, फिर विवाद” शीर्षक के साथ प्रमुखता से खबर प्रसारित की गई थी, बावजूद इसके जिम्मेदार पाली उप वनमंडलाधिकारी एवं परिक्षेत्र अधिकारी- कर्मचारियों की आंखे नही खुली। इसे लेकर लोग अब पूछ रहे हैं कि वन आरक्षित जमीन पर संबंधित विभाग के नाक नीचे खुलेआम कब्जा हो रहा है, अब तक एक भी नोटिस, एक भी एफआईआर, न कोई ध्वस्तीकरण क्यों नही? क्या पाली वन अमले को मोतियाबिंद हो गया है, जो सड़क किनारे वनभूमि पर हो रहे निर्माण उन्हें दिखाई नही दे रहा? जंगल बचाने वाले ही जब मुख्यमार्ग से दिखने वाली वनभूमि नही बचा पा रहे तो अंदर के जंगल मे हालात क्या होगा? क्या इस भू- माफिया सिंडिकेट को इसी तरह पनपने देंगे अथवा इंतजार है कि धौराभांठा दूसरा नकटी बन जाए और फिर जांच कमेटी बने? बहरहाल इन “न देख पाने वाली आंखों” का शीर्ष स्तर के अधिकारियों द्वारा विभागीय उपचार किये जाने की आवश्यकता है, ताकि जिम्मेदारों की कर्तव्यविमूढ़ता आड़े न आए और जंगल, पर्यावरण संरक्षण के साथ वन कानून का पालन हो सके।



