कोरबा:- सावन की फुहार के साथ आने वाले छत्तीसगढ़ के दो प्राण त्योहार हरेली तिहार और नागपंचमी आज सांस ले रहे हैं, लेकिन वो सांस भी बहुत धीमी है। एक समय था जब गांव- गांव इन त्योहारों पर गूंजता था। आज वे गांव सुने हैं। आधुनिकता और डिजिटल जीवनशैली ने माटी की इस विरासत को इतिहास के पन्नों में धकेल दिया है।
सावन शुक्ल पंचमी को छत्तीसगढ़ का पहला लोक पर्व हरेली मनाया जाता है। यह किसानों का नववर्ष है। पहले इस पर्व के दिन खेत के सभी औजार हल, कुदाल, फावड़ा, गेंती, ट्रैक्टर को धोकर रंग- गेरू लगाकर पूजा होती थी। घर मे चावल के चीला, खुरमी, ठेठरी बनते थे। चौक- चौराहे पर युवाओं की टोली नारियल फेंक प्रतियोगिता करती थी और बच्चे बांस की गेंड़ी पर दौड़ लगाते थे। इस प्रकार पूरे गांव में उत्साह का मेला लगता था। लेकिन आज के दौर में सिर्फ औपचारिकता मात्र बच गया। किसान औजार धोकर पूजा कर लेते हैं। कुछ घरों में पकवान बनते हैं। नारियल फेंक और गेंड़ी की आवाज अब सुनाई नही देती। उसकी जगह बच्चों के हाथों में मोबाइल और युवाओं के हाथ मे रील और नशा है। इसी सावन में मनाया जाने वाला नागपंचमी भी दम तोड़ रहा है। नागपंचमी ग्रामीण क्षेत्रों में नागमत के नाम से प्रसिद्ध है। मान्यता है कि धरती को नागदेव ने अपने फन पर उठा रखा है, इसलिए साल में एक बार उनकी पूजा होती है। पहले घर- घर महिलाएं गोबर और गेरू से दीवारों पर नाग बनाती और उस पर कुमकुम लगाकर पूजा करती थी, रात भर नगमत के पारंपरिक लोकगीत गूंजते थे। सपेरे बीन बजाते हुए जीवित नागों के साथ घर- घर दर्शन कराने आते थे। डर के साथ श्रद्धा भी होती थी। अब सिर्फ मुख्य द्वार पर गोबर का नाग बना दिया जाता है। नगमत के गीत बंद हो गए और सपेरों का आना बहुत कम हो गया। ऐसे में विलुप्त होती इन परंपरा को लेकर गांवों के बुजुर्गों का कहना है कि अब संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, त्योहार मनाने के लिए टोली नही बनती, बच्चें अब गेंड़ी की जगह गेम खेलते व लोकगीत की जगह रील देखते हैं। वर्तमान दौर में नई पीढ़ी को स्कूलों में हरेली- नागपंचमी के महत्व ही नही पढ़ाया जाता, इसलिए वो इसे बैकवर्ड मानने लगे हैं। बुजुर्गों का मानना है कि हम मर जाएंगे तो ये पारंपरिक पर्व और इनके खेल- गीत भी मर जाएंगे। सरकार स्कूल में पढ़ाती है अकबर- बीरबल, लेकिन हरेली- नागपंचमी के महत्व नही बताती। इस स्थिति में छत्तीसगढ़ माटी के इन त्योहार का संरक्षण नही हुआ तो संस्कृति मर जाएगी। देखा जाए तो हरेली सिर्फ त्योहार नही किसान और प्रकृति का रिश्ता है। नागपंचमी भी पूजा नही, मनुष्य और जीव- जंतु के सह आस्तित्व का संदेश है। अगर समय रहते इन खेलों, गीतों और अनुष्ठानों को नही बचाया गया तो आने वाली पीढ़ी हरेली को सिर्फ छुट्टी और नागपंचमी को सिर्फ गोबर का नाग समझेगी। सरकार और समाज को चाहिए कि हर पंचायत और स्कूल में हरेली पर नारियल फेंक व गेंड़ी प्रतियोगिता अवश्य हो और नागपंचमी पर नगमत मंडलियों को भी मंच मिले, साथ ही पाठ्यक्रम में छत्तीसगढ़ के लोक पर्वों को जगह दी जाए। क्योंकि हर एक कौम तब तक जिंदा है जब तक उसके त्योहार जिंदा हैं। वरना हरेली और नागपंचमी दोनों विलुप्त प्रजाति की तरह खोकर रह जाएंगे।






























