कोरबा शनिवार सुबह से ही हर गांव हो या शहर की गली-मोहल्ले व कालोनियों में छेरछेरा… छेरछेरा की आवाज गूंजती रही। यह आवास अलग-अलग 5 या 10 की संख्या में घूमने वाले बच्चों द्वारा लगाई जा रही थी। बच्चों द्वारा उच्चारित यह आवाज सुनकर लोग उन्हें अन्नदान करने तैयार रहे। अन्न उत्पादक किसान भले ही गांव में रहते हैं, लेकिन दान की इस परंपरा का निर्वहन शहरी क्षेत्र के लोगों ने भी खुलकर किया। हर किसी ने मुक्तहस्थ, जो भी मौजूद रहा, दान देते रहे। चावल के साथ-साथ लोगों ने बच्चों को चॉकलेट, बिस्किट या अन्य खाने के पैकेट देकर उनके खुशी में शामिल होते रहे। ये बच्चे भले ही अपनी खुशी के लिए दान मांगते रहे, लेकिन उनकी खुशी से हमारे प्रदेश की लोक संस्कृति को वे कहीं न कहीं आगे बढ़ा रहे थे।
छेरछेरा पर्व पर बच्चों की टोलियां साल दर साल बढ़ती जा रही है। इसके बाद भी दान करने वाले लोग भी पीछे नहीं हट रहे हैं। दोपहर 3 बजे तक बच्चों की टोलियां शहर व गांव के किसी न किसी गली मोहल्ले व कॉलोनी में घूमती रही। बच्चों का थैला जैसे ही भर जाता, वे तुरंत आसपास के किराना दुकान पहुंचकर वहां बेचते रहे। किराना दुकान संचालक भी बिना किसी मोल भाव के सामान खरीदकर बच्चों की डिमांड पूरी करते रहे। बच्चे खाने-पीने की सामान खरीदते रहे तो किशोरवय बच्चे बदले में पैसे लेकर अपनी जरूरत अनुसार वस्तुएं लेते रहे।
छत्तीसगढ़ का गांव हो या शहर, हर जगह रहने वाले लोग अपनी लोक परंपरा व संस्कृति के इस पर्व को उत्साह से मनाते हैं, जहां दान के रूप में लोगों को धन गांवों में धान, शहरी क्षेत्र में चावल या अन्य कोई अन्न दिया जाता है। पौष पूर्णिमा के दिन छेरछेरा पर धान और अन्न देकर यह परंपरा निभाई जाती है। शनिवार को प्रदेश के हर जिले में इस परंपरा को निर्वहन करते हुए देखा गया। इसमें बच्चों का उत्साह अलग ही रहता है, जो समूह बनाकर मांगने निकलते हैं और ऐसा कोई भी घर नहीं होता है, जहां से उन्हें निराश होकर लौटना पड़ता है।


