कोरबा। जंगलों से हाथियों के गांव की ओर आने की खबर अक्सर ग्रामीणों के लिए चिंता और डर लेकर आती है। फसलों की सुरक्षा, घरों को नुकसान और जान-माल की चिंता के बीच कोरबा के करतला क्षेत्र से सामने आई एक तस्वीर इस रिश्ते का दूसरा पहलू दिखाती है। यहां जंगल में जन्मे हाथी के एक नन्हे शावक के लिए ग्रामीणों ने मिलकर ऐसा आयोजन किया, जिसने इंसान और वन्यजीव के बीच रिश्ते की एक अलग तस्वीर पेश कर दी।
करतला वन परिक्षेत्र के सजापानी सहित आसपास के सात गांवों के ग्रामीणों ने हाथी के बच्चे की छठी का आयोजन किया। ग्रामीणों ने पारंपरिक रीति-रिवाज के साथ शावक का नाम ‘काशी’ रखा। भजन-कीर्तन और सामूहिक सहभागिता के बीच आयोजित इस कार्यक्रम में ग्रामीणों का उत्साह देखते ही बना।
इस आयोजन की खास बात यह रही कि जंगल के इस नन्हे मेहमान को ग्रामीणों ने सिर्फ एक वन्यजीव के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसके जन्म को अपनी खुशियों से जोड़ लिया। सामान्य तौर पर जहां हाथियों की मौजूदगी गांवों में तनाव का कारण बनती है, वहीं इस बार एक हाथी शावक ग्रामीणों के बीच खुशी और उत्साह की वजह बना।
कार्यक्रम में वनमंडल के एसडीओ मणिकांत वर्मा की मौजूदगी रही। वन विभाग की ओर से ग्रामीणों की इस पहल को वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता और संरक्षण की दिशा में सकारात्मक संदेश के रूप में देखा गया।
संघर्ष के बीच सह-अस्तित्व की उम्मीद
कोरबा वनांचल में मानव और हाथियों के बीच संघर्ष कोई नई चुनौती नहीं है। हाथियों की आवाजाही से कई बार ग्रामीणों की फसलें प्रभावित होती हैं और सुरक्षा को लेकर गंभीर परिस्थितियां भी बनती हैं। इसलिए केवल भावनात्मक जुड़ाव से इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। ग्रामीणों की सुरक्षा, हाथियों की निगरानी, समय पर सूचना और वन विभाग की त्वरित कार्रवाई उतनी ही जरूरी है।
लेकिन ‘काशी’ की छठी ने यह जरूर दिखाया है कि संघर्ष के बीच भी संवेदना की जगह बनाई जा सकती है। ग्रामीणों की यह पहल वन्यजीवों को लेकर समाज की सोच में सकारात्मक बदलाव की मिसाल बन सकती है।
‘काशी’ ने दिया बड़ा संदेश
एक नन्हे हाथी के जन्म पर सात गांवों का एक साथ आना महज एक धार्मिक या पारंपरिक आयोजन नहीं रहा। इसने जंगल और गांव के बीच उस रिश्ते को सामने रखा, जिसमें प्रकृति को केवल संसाधन नहीं बल्कि जीवन का हिस्सा माना जाता है।
‘काशी’ की छठी से निकला संदेश साफ है—जंगल और गांव के बीच दूरी नहीं, समझ और संतुलन जरूरी है। अगर ग्रामीणों की संवेदनशीलता के साथ वन विभाग की वैज्ञानिक रणनीति और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था जुड़ जाए, तो मानव-हाथी संघर्ष को कम करने की दिशा में बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं।
करतला के सात गांवों ने एक नन्हे शावक की छठी मनाकर यह बता दिया कि जंगल के बीच रहने वाला इंसान वन्यजीवों के साथ सिर्फ संघर्ष नहीं, सह-अस्तित्व का रिश्ता भी कायम कर सकता है

