SN india news से जितेन्द्र दास महंत कि रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा धान उपार्जन को लेकर स्पष्ट गाइडलाइन जारी की गई है, ताकि किसानों को किसी भी प्रकार की परेशानी न हो और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रहे।
सरकारी नियमों के अनुसार किसान केवल अपना धान उपार्जन केंद्र तक लाएगा। इसके बाद धान की उतराई, तौल, बोरी में भराई, सिलाई, जमाव (स्टैकिंग) और गोदाम में रखने का पूरा कार्य केंद्र प्रभारी द्वारा नियुक्त मजदूरों से कराया जाना चाहिए। किसानों से किसी भी प्रकार का “हमारी” या लेबर का काम लेना पूरी तरह प्रतिबंधित है।

इसके अलावा सरकार की गाइडलाइन में यह भी साफ है कि धान की तौल मानक 40 किलो प्रति बोरी के अनुसार ही की जाएगी और किसानों से किसी भी तरह की अवैध वसूली नहीं की जाएगी।
लेकिन कोरबा जिले के करतला ब्लॉक अंतर्गत ग्राम पटिया पाली स्थित धान उपार्जन केंद्र में इन सभी नियमों को खुलेआम ताक पर रखा जा रहा है।
यहाँ किसानों से जबरन लेबर का काम कराया जा रहा है। धान खाली करवाने से लेकर बोरी उठवाने, सिलाई कराने और जमाव तक का काम किसानों से ही कराया जा रहा है, जो सीधे-सीधे सरकारी गाइडलाइन का उल्लंघन है।
इतना ही नहीं, किसानों से प्रति आवक ₹100 से ₹200 तक अवैध रूप से वसूली की जा रही है।
किसानों का आरोप है कि एक बोरी में 40 किलो की जगह लगभग 41 किलो तक धान तौला जा रहा है, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि यह सब तहसीलदार की मौजूदगी के बावजूद हो रहा है। यदि प्रशासनिक निगरानी में ही सरकारी नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं, तो फिर किसानों को न्याय कैसे मिलेगा?
सरकार एक तरफ किसानों की आय बढ़ाने और पारदर्शी खरीदी की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर उसी सरकार की गाइडलाइन का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है।
अब सवाल यह है कि —
क्या जिला प्रशासन इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करेगा?
क्या दोषी केंद्र प्रभारी और कर्मचारियों पर कार्रवाई होगी?
और क्या किसानों से हुई अवैध वसूली व कम तौल की भरपाई की जाएगी?
या फिर सरकारी गाइडलाइन सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाएगी?
किसानों ने मांग की है कि पटिया पाली उपार्जन केंद्र की तत्काल जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि भविष्य में किसी भी किसान के साथ इस तरह का शोषण न हो।




