कोरबा। 14/6/1026
जिले में कानून का इकबाल बुलंद है या फिर रेत माफियाओं का रसूख प्रशासनिक आदेशों पर भारी पड़ रहा है यह सवाल इस समय कोरबा के जागरूक नागरिकों की जुबान पर है। कलेक्टर कुणाल दुदावत के कड़े निर्देश और उप संचालक खनिज प्रशासन के मार्गदर्शन में बकायदा ढिंढोरा पीटा गया था कि 10 जून से 15 अक्टूबर तक जिले के सभी रेत घाटों से रेत निकालने पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। बाकायदा ‘विशेष अभियान’ के दावे किए गए थे। लेकिन हकीकत की जमीन पर इन दावों की रेत दरकती नजर आ रही है।
नियमों को ठेंगे पर रखकर रेत माफिया आज भी धड़ल्ले से नदियों का सीना चीर रहे हैं। आखिर कलेक्टर साहब के आदेशों की सरेआम धज्जियां उड़ाने की हिम्मत इन माफियाओं में कहां से आ रही है?
कागजों पर ‘विशेष अभियान’, जमीन पर ‘माफिया राज’
प्रशासन ने मानसून के मद्देनजर नदियों के संरक्षण और पर्यावरण सुरक्षा के लिए 10 जून से रेत उत्खनन पर रोक लगाई थी। उम्मीद थी कि खनिज विभाग की टीमें मुस्तैद रहेंगी, लेकिन प्रतिबंध लागू होते ही विभाग मानो ‘चैन की नींद’ सो गया है। रात के अंधेरे से लेकर दिन के उजाले तक, प्रतिबंधित घाटों से ट्रैक्टर और हाइवा की कतारें साफ गवाही दे रही हैं कि पाबंदी सिर्फ कागजों तक सीमित है।
बड़ा सवाल: जानकारी देने के बाद भी कई खनिज की टीम अपने काम से पल्ला झाड़ देते है और कई खनिज अधिकारी जो फोन नहीं उठाते है जब आम जनता को यह अवैध काम साफ दिखाई दे रहा है, तो उड़नदस्ता दल और खनिज विभाग के अधिकारियों को यह क्यों नजर नहीं आता? क्या यह विभागीय अनदेखी है या फिर जानबूझकर बंद की गई आंखें?
किसकी शह पर चल रहा है यह ‘सफेद खेल’?
बिना किसी रसूख या ‘भीतरी संरक्षण’ के इतने बड़े पैमाने पर प्रतिबंध का उल्लंघन मुमकिन नहीं है। जनता के बीच अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि इस धड़ल्ले से चल रहे अवैध कारोबार के पीछे ‘काली कमाई’ का तगड़ा नेक्सस (मिलीभगत) काम कर रहा है।
क्या खनिज विभाग के कुछ जिम्मेदार जमीनी हकीकत से वाकई अनजान हैं?
या फिर ‘सुविधा शुल्क’ के बदले नियमों को ताक पर रख दिया गया है?
कार्रवाई के नाम पर केवल छोटी मछलियों (Equipments/Tractors) को पकड़कर औपचारिकता क्यों पूरी की जाती है, जबकि मुख्य सरगना खुलेआम घूम रहे हैं?
अधिकारी महोदय, अब तो खोलिए आंखों की पट्टी!
खनिज विभाग के आला अधिकारियों को अब एसी कमरों और फाइलों के बंडल से बाहर निकलकर धरातल पर देखना होगा। यह सिर्फ एक नियम का उल्लंघन नहीं है, बल्कि:
शासकीय आदेशों की अवहेलना: यह सीधे तौर पर जिला कलेक्टर के आदेशों को चुनौती है।
राजस्व की भारी क्षति: बिना रॉयल्टी के लाखों का माल पार किया जा रहा है।
पर्यावरण से खिलवाड़: मानसून के दौरान अवैध उत्खनन से नदियों का जलस्तर और स्वरूप बिगड़ रहा है, जिससे भविष्य में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
अब देखना यह है कि… इस खबर के बाद खनिज विभाग अपनी ‘कुंभकर्णी नींद’ से जागता है या फिर माफियाओं के साथ यह ‘मौन सहमति’ का खेल यूं ही जारी रहता है। कलेक्टर कुणाल दुदावत को स्वयं इस मामले में कड़ा संज्ञान लेते हुए औचक निरीक्षण करना चाहिए, ताकि यह साफ हो सके कि जिले में कानून का राज है, किसी माफिया का नहीं।



