विशेष रिपोर्ट |
कोरबा/ज़िला मुख्यालय: ज़िले में अवैध रेत खनन और परिवहन का काला कारोबार थमने का नाम नहीं ले रहा है। एक तरफ ज़िला कलेक्टर द्वारा अवैध खनन पर पूरी तरह से अंकुश लगाने और ज़ीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने के सख्त निर्देश दिए गए हैं, वहीं दूसरी तरफ खनिज विभाग की सुस्ती और अनदेखी के कारण रेत माफिया के हौसले पूरी तरह बुलंद हैं।
हाल ही में सामने आए एक चौंकाने वाले वीडियो ने ज़िला प्रशासन और खनिज विभाग के दावों की हवा निकाल कर रख दी है।
कैमरे पर चालक का बेबाक खुलासा
सड़क पर दौड़ रहे रेत से लदे एक ट्रैक्टर को जब रोका गया और चालक से कार्रवाई का डर न होने के बारे में पूछा गया, तो उसने बिना किसी झिझक के विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा खुलासा कर दिया।
चालक का बयान:
“गाड़ी जब खनिज वाले पकड़ते हैं, तो बात कराते हैं सेठ से… फिर छोड़ देते हैं।”
ट्रैक्टर चालक के इस एक वाक्य ने यह साफ कर दिया है कि ज़िले में अवैध रेत का परिवहन किसी अनजाने में नहीं, बल्कि ‘सुनियोजित सेटिंग’ और संरक्षण के तहत चल रहा है।
खनिज विभाग की भूमिका पर उठते गंभीर सवाल
चालक का यह बयान सीधे तौर पर खनिज विभाग की कार्यप्रणाली, निष्पक्षता और नीयत पर सीधे सवाल खड़े करता है:
सांठगांठ का खेल: क्या खनिज विभाग के कुछ अधिकारी/कर्मचारी केवल औपचारिकता निभा रहे हैं और ‘ऊपर’ (रेत माफिया/सेठ) से बात होते ही गाड़ियों को बिना सीज किए छोड़ दिया जाता है?
कलेक्टर के निर्देशों की अवहेलना: जब ज़िला प्रमुख के स्पष्ट निर्देश हैं, तो निचले स्तर पर इस तरह का ‘म्युचुअल अंडरस्टैंडिंग’ का खेल किसके शह पर जारी है?
राजस्व को चपत: इस पूरे सिंडिकेट के कारण हर महीने शासन को लाखों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है, जबकि पर्यावरण की धज्जियां अलग उड़ रही हैं।
अब पानी सिर से ऊपर: क्या होगी कड़ी कार्रवाई?
छोटे चालकों पर कभी-कभार नाममात्र की कार्रवाई करके खानापूर्ति करने वाला खनिज विभाग आखिर इस ‘सेठ’ और माफिया सिंडिकेट पर हाथ डालने से क्यों बच रहा है?
चालक का यह वायरल वीडियो अब प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बन चुका है। आम जनता और पर्यावरण प्रेमियों की नजरें अब ज़िला प्रशासन पर टिकी हैं:
क्या वायरल वीडियो के आधार पर जांच बैठाकर संबंधित ट्रैक्टर और उसके ‘सेठ’ पर FIR दर्ज होगी?
क्या मौके से गाड़ियों को छोड़ने वाले खनिज विभाग के संबंधित कर्मचारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी?
यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह मान लिया जाएगा कि ज़िले की नदियां और राजस्व पूरी तरह से माफिया-अधिकारी गठजोड़ के हवाले कर दिए गए हैं।



