सरकारी दफ्तर जनता की सुविधा और व्यवस्था संचालन के केंद्र माने जाते हैं। यहां उपयोग होने वाला हर संसाधन — चाहे वह बिजली हो, वाहन हो या ईंधन — सीधे जनता के टैक्स के पैसे से संचालित होता है। ऐसे में यदि इन्हीं संसाधनों के निजी उपयोग के आरोप सामने आने लगें, तो सवाल केवल एक अधिकारी पर नहीं बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की पारदर्शिता पर खड़े होते हैं।इन दिनों जिले के महिला एवं बाल विकास विभाग में पदस्थ विभाग प्रमुख अनीता अग्रवाल को लेकर सामने आए आरोपों ने यही बहस छेड़ दी है। सरकारी कार्यालय की बिजली से निजी वाहन चार्ज करने, सरकारी वाहन और ईंधन का निजी उपयोग करने तथा मुख्यालय से बाहर रहकर रोजाना अप-डाउन करने जैसे आरोप अब चर्चा का विषय बने हुए हैं।
मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि यह आरोप किसी सामान्य कर्मचारी पर नहीं बल्कि विभाग की प्रमुख अधिकारी पर लगे हैं। यदि विभाग प्रमुख ही सरकारी संसाधनों के उपयोग को लेकर सवालों के घेरे में हों, तो अधीनस्थ कर्मचारियों में क्या संदेश जाएगा, यह समझना मुश्किल नहीं है।बताया जा रहा है कि सरकारी कार्यालय परिसर में निजी इलेक्ट्रिक वाहन चार्ज किए जाने के दृश्य कैमरे में कैद हुए हैं। दूसरी ओर बिलासपुर स्थित निजी आवास पर सरकारी वाहन खड़े होने का दावा भी किया जा रहा है। यदि ऐसा है, तो यह केवल सुविधा का मामला नहीं बल्कि जवाबदेही का विषय भी बनता है।सरकारी वाहन किसी अधिकारी की निजी संपत्ति नहीं होते। उनका उद्देश्य सरकारी कार्यों का निष्पादन होता है। इसी तरह सरकारी बिजली और ईंधन का उपयोग भी तय नियमों और सीमाओं के भीतर किया जाना चाहिए। लेकिन जब इन संसाधनों का उपयोग निजी जीवन की सुविधा बढ़ाने के लिए होने लगे, तो आम जनता के मन में स्वाभाविक रूप से नाराजगी पैदा होती है।इस पूरे विवाद में एक और गंभीर पहलू पत्रकारों के साथ कथित व्यवहार को लेकर सामने आया। लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका सवाल पूछने और व्यवस्था की वास्तविकता सामने लाने की होती है। यदि किसी मुद्दे की पड़ताल करने पहुंचे पत्रकारों से ही नाराजगी या दबाव की स्थिति बने, तो यह स्वस्थ प्रशासनिक संस्कृति का संकेत नहीं माना जा सकता।
हालांकि आरोपों की निष्पक्ष जांच होना जरूरी है। किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले प्रशासनिक स्तर पर तथ्य सामने आना चाहिए। यदि सब कुछ नियमों के तहत हुआ है तो संबंधित अनुमति और दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने चाहिए। लेकिन यदि सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग हुआ है, तो कार्रवाई भी उतनी ही पारदर्शी होनी चाहिए।यह मामला केवल एक विभाग या एक अधिकारी तक सीमित नहीं है। यह उस सोच का प्रश्न है जिसमें सरकारी संसाधनों को “सुविधा” समझ लिया जाता है, जबकि वे जनता की अमानत होते हैं। प्रशासन में बैठे जिम्मेदार लोगों से अपेक्षा केवल कामकाज की नहीं बल्कि उदाहरण प्रस्तुत करने की भी होती है। क्योंकि जब जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग ही सवालों में घिरने लगें, तब व्यवस्था पर जनता का भरोसा कमजोर पड़ने लगता है।
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