गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले से पर्यावरण विनाश और सरकारी जमीन की लूट का एक बेहद सनसनीखेज मामला सामने आया है। पेंड्रा वन परिक्षेत्र के अंतर्गत आने वाले जिल्दा सर्किल के ग्राम जिल्दा में वन भूमि पर कथित तौर पर हुए अवैध कब्जे ने पूरे प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा दिया है। स्थानीय स्तर पर हुई गंभीर शिकायतों में यह खुलासा हुआ है कि इस संरक्षित वन क्षेत्र को पूरी तरह तबाह कर दिया गया है। भू-माफियाओं और अतिक्रमणकारियों के हौसले इतने बुलंद थे कि उन्होंने इस वन भूमि पर न केवल अपना अवैध साम्राज्य खड़ा किया, बल्कि वहां मौजूद करोड़ों रुपये की कीमत के बेशकीमती सागौन के पेड़ों को भी अंधाधुंध तरीके से काट डाला। ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों के बढ़ते आक्रोश के बाद अब इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग चौतरफा गूंजने लगी है।
शिकायत में 25 लोगों के नामों का उल्लेख
प्राप्त शिकायत के अनुसार, जिन व्यक्तियों के नाम कथित रूप से वन भूमि अतिक्रमण और वन क्षति से जुड़े मामले में उल्लेखित किए गए हैं, उनमें राम गरीब/नाथूराम साहू, सुरजीत/हरिसिंह साहू, सेमलाल पनिका, हरिओम/मोतीलाल साहू, बहादुर/बालाराम साहू, गोकुल/जवाहिर पनिका, गोपाल/धनसिंह गोड, राजेंद्र/गणेश पनिका, शारदा बाई/रतिराम पनिका, सामर सिंह/हरिसिंह यादव, समरसिंह यादव, हरवीर सिंह, मंगलसिंह, चंपल सिंह/हरिसिंह, मथुरा प्रसाद/लालसिंह, राजकुंवर/मिलपसिंह, रामकुमार/प्रताप सिंह, जितेंद्र सिंह/इंद्रजीत सिंह कंवर, गुलाब सिंह/समार सिंह, अर्जुन सिंह, रामचरण/आनंदराम यादव, भाव सिंह/आनंदराम यादव, रमेश कुमार/कल्याण पनिका, पंचराम/रामचरण पनिका तथा रामप्रसाद के नाम शामिल बताए गए हैं।
साजिश के तहत बदला गया जंगल का भूगोल
शिकायतकर्ताओं ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि वन भूमि पर कब्जे का यह खेल रातों-रात नहीं हुआ, बल्कि इसे एक सोची-समझी साजिश के तहत अंजाम दिया गया। यह पूरी प्रक्रिया लंबे समय से धीरे-धीरे विकसित की गई ताकि किसी को अचानक शक न हो। जिस जमीन पर आज अतिक्रमणकारियों का कब्जा बताया जा रहा है, वहां पहले सागौन के घने और मूल्यवान वृक्षों के साथ-साथ अन्य वन प्रजातियों के पेड़ लहलहाते थे। इन पेड़ों को चुपके से काटकर ठिकाने लगाया गया और फिर भूमि का स्वरूप बदलकर उसे खेती या अन्य गतिविधियों के लिए तैयार कर लिया गया। हालांकि इन आक्रामक आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
इन लोगों पर लगा है पर्यावरण की तबाही का संगीन आरोप
जिल्दा में हुए इस कथित भूमि घोटाले में जिन लोगों को मुख्य आरोपी और अतिक्रमणकारी बताया जा रहा है, उनकी एक लंबी सूची सामने आई है। प्राप्त शिकायत के अनुसार, इस पूरे खेल में राम गरीब साहू और सुरजीत साहू के साथ सेमलाल पनिका की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है। दावा किया जा रहा है कि इन दर्जनों नामों के अलावा भी कई अन्य रसूखदार लोग पर्दे के पीछे से इस सिंडिकेट को चला रहे हैं।
सवालों के घेरे में वन विभाग की संदेहास्पद भूमिका
इस पूरे मामले के सार्वजनिक होने के बाद सबसे बड़ा प्रहार वन विभाग की कार्यप्रणाली पर हुआ है। स्थानीय ग्रामीणों में इस बात को लेकर तीव्र आक्रोश है कि आखिर सुरक्षा के लिए जिम्मेदार अमला क्या कर रहा था। यदि इतने बड़े पैमाने पर सागौन के प्रतिबंधित और मूल्यवान पेड़ों की कटाई की जा रही थी, तो संबंधित बीट गार्ड, वनपाल और आला अधिकारियों को इसकी भनक क्यों नहीं लगी। यदि उन्हें इस बात की जानकारी थी, तो समय रहते अपराधियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की गई। लोगों का सीधा आरोप है कि यह पूरा खेल बिना किसी अंदरूनी मिलीभगत या प्रशासनिक ढिलाई के मुमकिन ही नहीं था, इसलिए केवल कथित अतिक्रमणकारियों पर ही नहीं, बल्कि पूरे निगरानी तंत्र की भूमिका पर भी कड़ी जांच होनी चाहिए।
सैटेलाइट तस्वीरों और कड़े सीमांकन की उठी पुरजोर मांग
जिल्दा के पर्यावरण प्रेमियों और शिकायतकर्ताओं ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। उन्होंने प्रशासन के सामने स्पष्ट मांग रखी है कि इस मामले को केवल कागजी खानापूर्ति तक सीमित न रखा जाए। इसके लिए वन विभाग और राजस्व विभाग की एक संयुक्त हाई-पावर टीम का गठन होना चाहिए, जो मौके पर जाकर विवादित भूमि का कड़ा सीमांकन करे। इसके साथ ही पिछले कुछ वर्षों के पुराने सरकारी रिकॉर्ड और उपग्रह चित्रों यानी सैटेलाइट इमेजरी का गहराई से परीक्षण किया जाए ताकि यह साफ हो सके कि किस तारीख को वहां घना जंगल था और कब पेड़ गायब हुए। इसके अलावा काटे गए सागौन के पेड़ों की सटीक संख्या का आकलन कर दोषियों के खिलाफ वन संरक्षण अधिनियम के तहत गैर-जमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज होना चाहिए।
पारिस्थितिकी तंत्र पर संकट और प्रशासन का रहस्यमयी मौन
विशेषज्ञों का साफ कहना है कि वनों की यह अंधाधुंध कटाई सिर्फ सरकारी संपत्ति का नुकसान नहीं है, बल्कि यह हमारे पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता पर सीधा प्रहार है, जिसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। इस बेहद संवेदनशील और बड़े मामले पर फिलहाल वन विभाग और जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों ने रहस्यमयी चुप्पी साध रखी है। क्षेत्र के लोगों की नजरें अब आगामी प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं कि क्या सरकार इन रसूखदारों के खिलाफ सख्त कदम उठाएगी या मामला रफा-दफा हो जाएगा।



