कोरबा जिले के करतला विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत दमखांचा में शासन की योजनाओं को किस तरह मज़ाक बनाया जा रहा है, इसका जीता-जागता उदाहरण सामने आया है। यहां चावल वितरण के नाम पर भारी लापरवाही, मनमानी और कथित भ्रष्टाचार की बू साफ़-साफ़ महसूस की जा रही है।
ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें समय पर राशन नहीं मिलता, महीनों से शक्कर और चना वितरण बंद है, और जब चावल मिलता भी है तो पहले ही फिंगरप्रिंट ले लिया जाता है और कई दिनों बाद राशन दिया जाता है। सवाल यह है कि आखिर किस नियम के तहत पहले अंगूठा और बाद में राशन? क्या यह खुला खेल नहीं है?
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब शिकायत की जानकारी लेने पहुंचे स्थानीय पत्रकारों के साथ भी सरपंच और सचिव ने बदसलूकी की। ग्रामीणों के सामने ही पत्रकारों से तू-तड़ाक, गाली-गलौज और जानकारी देने से साफ इनकार—क्या यही है “सुशासन”? महिला पत्रकार के साथ दुर्व्यवहार की घटना तो और भी शर्मनाक है।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि पंचायत सचिव अक्सर शराब के नशे में कार्यालय पहुंचते हैं और उसी हालत में काम करते हैं। आज भी चावल वितरण के दौरान उनका व्यवहार सवालों के घेरे में रहा।
सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि जब इस पूरे मामले की जानकारी जनपद पंचायत करतला के सीईओ को दी गई, तो उन्होंने तुरंत कार्रवाई करने के बजाय “पहले शिकायत करो” कहकर पल्ला झाड़ लिया। क्या प्रशासन अब सिर्फ कागजी शिकायतों का मोहताज रह गया है?
सचिव द्वारा पत्रकार को खुलेआम धमकी देना—“जो छापना है छाप लो, मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता”—यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं उसे किसी बड़े संरक्षण का भरोसा है। अब सवाल उठता है कि आखिर यह हिम्मत उसे कहां से मिल रही है?
जब प्रदेश के मुख्यमंत्री “सुशासन तिहार” के तहत गांव-गांव जाकर जनता की समस्याएं सुनने की बात कर रहे हैं, उसी समय दमखांचा पंचायत में इस तरह की लापरवाही और दबंगई शासन के दावों पर सीधा तमाचा है।
अब देखना होगा—क्या प्रशासन इस मामले में सिर्फ खानापूर्ति करेगा या वाकई दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी?
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