कोरबा। जिला प्रशासन और खनिज विभाग की नाक के नीचे रेत चोरों का आतंक एक बार फिर अपने चरम पर है। कुछ दिनों की शांति और दिखावे के “नियम-कायदे” के बाद, रेत माफिया ने एक बार फिर अपने असली रंग दिखाने शुरू कर दिए हैं। अब न तो इन्हें कलेक्टर साहब के सख्त आदेशों की परवाह है, और न ही कानून का कोई खौफ।
खनिज संपदा की इस खुली लूट में कुछ नाम इन दिनों हवा में तैर रहे हैं। कभी चर्चा होती है ‘बालको के वेदप्रकाश’ की, तो कभी सिक्का चलता है ‘कोरबा के भाईजान’ का। यही नहीं, ‘साहू’ और ‘यादव’ जैसे रसूखदार नाम भी इस अवैध खेल के मुख्य खिलाड़ी बताए जा रहे हैं।
नियम गए तेल लेने, अब सिर्फ ‘खेला’ होगा!
कलेक्टर साहब ने जब आदेश जारी किए थे, तो लगा था कि रेत माफिया पर लगाम कसेगी। कुछ दिन गाड़ियां थमीं, नियम माने गए, लेकिन वह सिर्फ एक ‘ट्रेलर’ था। अब पूरी पिक्चर सामने आ चुकी है। नदियों का सीना चीरकर दिन-रात अवैध रेत निकाली जा रही है।
बड़ा सवाल: आखिर इन रसूखदारों को प्रशासन और खनिज विभाग का डर क्यों नहीं है? क्या इन्हें हरी झंडी मिली हुई है, या फिर विभाग की ‘रहस्यमयी चुप्पी’ के पीछे कोई बड़ा खेल है?
खुलेआम लूट, बेबस तंत्र
जब-जब कार्रवाई की बात आती है, खनिज विभाग कागजी घोड़े दौड़ाकर शांत हो जाता है। लेकिन जमीन पर हकीकत यह है कि ट्रैक्टर और हाइवा बिना किसी डर के, खुलेआम रेत खपा रहे हैं।
वेदप्रकाश और भाईजान का जलवा: बालको से लेकर कोरबा तक, इन ‘भाईजानों’ का खौफ ऐसा है कि आम जनता तो दूर, छोटे कर्मचारी भी मुंह खोलने से कतराते हैं।
साहू और यादव की जुगलबंदी: रेत के इस अवैध सिंडिकेट में जाति और क्षेत्र की सीमाएं खत्म हो चुकी हैं। जिसका जहां दांव लग रहा है, वह वहां से सरकारी खजाने को चूना लगा रहा है।
साहब, अब तो जागिए!
जनता अब सीधे कलेक्टर साहब की तरफ देख रही है। अगर इन ‘भाईजानों’ और ‘रसूखदारों’ पर अब भी हंटर नहीं चला, तो आदेश सिर्फ कागजों की शोभा बढ़ाते रहेंगे और कोरबा की नदियां पूरी तरह खोखली हो जाएंगी।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस खुली चुनौती को स्वीकार करता है या फिर माफिया राज के आगे घुटने टेक देता है!



