छत्तीसगढ़ / कोरबा
कोरबा जिले के बालको वन परिक्षेत्र अंतर्गत चुईया नाला में प्रकृति का सीना चीरकर खड़े किए गए अवैध रेत साम्राज्य पर जब मीडिया की नजर पड़ी, तो खनिज विभाग ने कार्रवाई का ऐसा अनोखा और गैर-कानूनी तरीका कार्य किया जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र की निष्पक्षता पर कालिख पोत दी है। खबर के सार्वजनिक होते ही अपनी गर्दन फंसती देख विभाग के अधिकारियों ने मामले की विधिवत जांच करने या दोषियों पर नकेल कसने के बजाय, पूरे अपराध स्थल से सबूतों को ही हमेशा के लिए मिटाने का आपराधिक दुस्साहस कर डाला।
प्राप्त जानकारी व प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही के अनुसार मौके पर पहुंचे खनिज विभाग के अमले ने न तो अवैध डंप की नपाई की न जब्ती का पंचनामा तैयार किया और न ही उसे राजसात करने की वैधानिक फाइल खोली। इसके ठीक उलट, भारी जेसीबी मशीन को उतारकर हजारों घन मीटर की तादाद में डंप रेत को दिनदहाड़े चारों ओर फैलाकर मिट्टी में मिला दिया गया। यह पूरी कवायद केवल इसलिए की गई ताकि यदि कोई वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी या स्वतंत्र एजेंसी जांच के लिए पहुंचे तो उसे वहां अवैध उत्खनन और भंडारण का कोई ठोस आधार ही न मिले।
कानूनी प्रक्रिया का खुल्लम-खुल्ला कत्ल, जब्ती और नीलामी की जगह विनाश लीला ji हाँ छत्तीसगढ़ गौण खनिज नियमावली तथा राजस्व संहिताओं का स्पष्ट विधान है कि किसी भी स्थान पर अवैध खनिज का भंडारण पाए जाने पर राजस्व व खनिज अमले द्वारा पंचों के समक्ष स्थल निरीक्षण कर वास्तविक मात्रा घन मीटर का पंचनामा बनाया जाता है।
संबंधित अवैध कब्जाधारी डंपकर्ता और भूमि स्वामी के विरुद्ध जब्ती पत्रक तामील कर अर्थदंड या विधिक अभियोजन की कार्यवाही संस्थित की जाती है।
जब्त खनिज को शासन के अधीन लेकर विधिवत निविदा या नीलामी के जरिए सरकारी राजकोष में लाखों-करोड़ों रुपये का राजस्व जमा कराया जाता है। किंतु चुईया नाला में खनिज निरीक्षक मदन साहू, अजय कुमार राठौर, शिव कुमार जांगड़े, धर्मेंद्र गुप्ता एवं सिपाही संजू लहरे की मौजूदगी में नियमों की ऐसी धज्जियां उड़ाई गईं जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। सवाल उठता है कि किस सक्षम प्राधिकारी या न्यायालय ने इन्हें सरकारी संपत्ति के समतुल्य इस बहुमूल्य खनिज संपदा को मिट्टी में मिलाने का विशेषाधिकार दिया था? स्पष्ट है कि यह कदम कानून की रक्षा के लिए नहीं बल्कि कानून को चकमा देने के लिए उठाया गया।
माफिया को ‘सुरक्षा कवच’, सरकारी खजाने को करोड़ों की चोट इस पूरे घटनाक्रम के पीछे का सच बेहद घिनौना प्रतीत होता है। यदि रेत का वह विशालकाय ढेर मौके पर यथावत रहता तो तकनीकी टीम द्वारा की गई नापजोख से यह साबित हो जाता कि रेत माफिया करम सिंह, उपसरपंच इरफान, वर्तमान सरपंच व सरपंच पति सहित बालको क्षेत्र के रसूखदार सिंडिकेट ने पर्यावरण और शासन को कितने करोड़ रुपये की क्षति पहुंचाई है।
उस नापजोख से बचने और सिंडिकेट को जेल की सलाखों से दूर रखने के लिए अधिकारियों ने खुद ही साक्ष्यों पर जेसीबी चलवा दिया। कमजोर और लाचार ट्रैक्टर चालकों पर तुरंत जब्ती की गाज गिराने वाले विभाग का यह दोहरा चरित्र चीख-चीख कर कह रहा है कि तंत्र पूरी तरह से रेत माफिया की चौखट पर नतमस्तक हो चुका है।
जांच एजेंसियों व शासन के समक्ष सुलगते बिंदु,
साक्ष्य नष्ट करने का अपराध?
भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत किसी आपराधिक कृत्य के साक्ष्यों को जानबूझकर नष्ट करना सीधे तौर पर गैर-जमानती अपराध है। क्या खनिज निरीक्षक मदन साहू व उनकी टीम पर साक्ष्य विलोपन और आपराधिक षड्यंत्र की धाराएं लगाई जाएंगी?
राजस्व हानि की वसूली किससे ?
जिस रेत की नीलामी से शासन के खजाने में लाखों का राजस्व आता उसे मिट्टी में मिलाकर बर्बाद करने वाले अधिकारियों के वेतन और संपत्ति से इस नुकसान की भरपाई क्यों न की जाए?
यह मामला अब केवल अवैध उत्खनन तक सीमित नहीं है बल्कि यह पद, वर्दी और सरकारी अधिकारों की आड़ में अपराध के सबूत मिटाने का एक बड़ा षड्यंत्र बन चुका है। जनहित और कानून के इकबाल को कायम रखने के लिए आवश्यक है कि उच्चाधिकारी इस मामले में तत्काल संज्ञान लेकर दोषी अमले को निलंबित करें और स्वतंत्र एजेंसी से जांच बैठाएं।
बने रहिए हमारी अगली ख़बर में और खुलासे के साथ



