छत्तीसगढ़ / कोरबा औद्योगिक विकास के चमचमाते नारों की ओट में जल, जंगल और जमीन के निगले जाने की दास्तान ऊर्जाधानी कोरबा में एक बार फिर सुलग उठी है। कोहड़िया क्षेत्र में फैली वन भूमि पर भारत एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड BALCO/ VEDANTA के कथित कब्जे का मामला अब केवल स्थानीय विवाद नहीं बल्कि कॉरपोरेट हठधर्मिता और प्रशासनिक तंत्र की रहस्यमयी साठगांठ का आईना बन चुका है।
यदि इस बेशकीमती जंगल जमीन पर कंपनी का कब्जा कानूनी है, तो फिर आवंटन, लीज और वैधानिकता से जुड़े दस्तावेज जनता के सामने लाने से शासन-प्रशासन और प्रबंधन क्यों कतरा रहे हैं?
शिकायतकर्ता जीतेन्द्र के अनुसार प्रबंधन की बेलगाम मनमानी और फाइलों का खेल स्पष्ट हो गया है, औद्योगिक घराने जब ताकतवर हो जाते हैं तो कायदे-कानूनों की लक्ष्मण रेखाएं उनके इशारों पर सिमटने लगती हैं। कोहड़िया की हरियाली और स्थानीय निवासियों का नैसर्गिक अधिकार धीरे-धीरे संयंत्रों की चारदीवारियों के भीतर कैद कर दिया गया। जब भी प्रबंधन से वैधानिकता का प्रमाण मांगा गया तो जवाब देने के बजाय कानूनी पेचीदगियों और प्रक्रियात्मक आड़ का सहारा लिया गया। यदि सब कुछ पाक-साफ और नियमों के तहत है, तो इन दस्तावेजों को सार्वजनिक करने में यह संकोच और हिचक कैसी? क्या कॉरपोरेट सत्ता खुद को संविधान और वन संरक्षण कानून से भी ऊपर मान चुकी है?
व्यवस्था का दोहरा चरित्र, कमजोर पर डंडा, ताकतवर के आगे नतमस्तक? इस पूरे खेल में सबसे निराशाजनक पहलू राजस्व और वन विभाग की रहस्यमयी चुप्पी है। यह वही प्रशासनिक तंत्र है, जो किसी गरीब या आदिवासी द्वारा अपनी झोपड़ी या आजीविका के लिए वन भूमि पर जरा सा कदम रखने पर बुलडोजर और कानूनी धाराओं का तांडव खड़ा कर देता है। लेकिन जब बात वेदांता जैसे विशालकाय कॉरपोरेट घराने की आती है, तो सारा प्रशासनिक अमला बेबस, मूक और बहरा नजर आने लगता है। न तो वास्तविक सीमांकन की हिम्मत दिखाई जाती है और न ही कब्जे की हकीकत को उजागर करने का साहस। यह दोहरा रवैया साफ दर्शाता है कि तंत्र जनहित के बजाय औद्योगिक हितों का पहरेदार बनकर रह गया है।
शिकायतकर्ता ने कहा छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा तकनीकी और प्रक्रियात्मक आधारों पर जनहित याचिका PIL खारिज किए जाने के बाद प्रबंधन भले ही राहत की सांस ले रहा हो लेकिन इसे किसी भी सूरत में क्लीन चिट नहीं माना जा सकता। याचिका का खारिज होना कब्जे को वैध नहीं ठहराता। यही वजह है कि अब इस लड़ाई को निर्णायक मोड़ पर ले जाने की तैयारी में हैं। चूंकि यह मामला व्यापक जनहित पर्यावरण सुरक्षा और प्राकृतिक संपदा की खुली लूट से जुड़ा एक बेहद गंभीर मुद्दा है, इसलिए शिकायतकर्ता द्वारा देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की पूरी तैयारी कर ली गई है।
हाईकोर्ट से मिली तकनीकी राहत के आधार पर सत्य को दबाने की कोशिशें अब शीर्ष अदालत की दहलीज पर बेनकाब होंगी। संविधान और जनता की अदालत में जवाबदेही तय होगी जी हाँ छत्तीसगढ़ का जल, जंगल और जमीन किसी निजी उद्योग घराने की जागीर नहीं बल्कि राज्य की अस्मिता और आने वाली पीढ़ियों की अमानत है। कोहड़िया की जमीन का यह संग्राम अब व्यवस्था की साख और न्यायपालिका के भरोसे की अंतिम परीक्षा है। फाइलों में दबाकर रखी गई सच्चाई को अब बाहर आना ही होगा,क्योंकि जब लड़ाई जनहित और संविधान की रक्षा की हो, तो कॉरपोरेट रसूख और प्रशासनिक लीपापोती ज्यादा दिन टिक नहीं पाती।





