कोरबा/पाली:- एक तरफ शासन- प्रशासन झोलाछाप डॉक्टरों पर रोक लगाने को लेकर बड़े- बड़े दावे करता है, वहीं पाली विकासखंड के ग्राम रजकम्मा में प्राथमिक- माध्यमिक शाला परिसर से सटकर ही एक बिना डिग्री के इलाज की सुसज्जित दुकान बीते कई वर्षों से बेखौफ संचालित हो रहा है। हैरानी की बात है कि स्कूल जैसे संवेदनशील स्थल के बगल में चल रहे इस अवैध क्लिनिक पर स्वास्थ्य विभाग की नजर नहीं पड़ रही है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार एक बंगाली युवक द्वारा अपने एक रिश्तेदार के होम्योपैथिक डिग्री की आड़ में एलोपैथिक क्लिनिक धड़ल्ले से चलाया जा रहा है। दिखाने के लिए क्लिनिक में 2- 4 होम्योपैथिक दवाइयां रखी गई हैं, लेकिन अंदर का सच कुछ और है। यहां सर्दी- खांसी से लेकर गंभीर बीमारियों के इलाज का दावा किया जाता है। बिना किसी मेडिकल डिग्री के मरीजों को इंजेक्शन लगाया जा रहा है, स्लाइन चढ़ाई जा रही है और बकायदा बेड की व्यवस्था तक रखी गई है। ग्रामीणों के अनुसार इस अवैध क्लिनिक की शिकायत पहले भी हो चुकी है। तब स्वास्थ्य अमला मौके पर पहुंचा, खानापूर्ति के लिए दुकान पर ताला भी जड़ा, लेकिन कुछ ही सप्ताह बाद उसी फर्जी डॉक्टर की दुकान के पट फिर से खुल गए।
एक गलत इंजेक्शन ने छीने दो मासूमों के सिर से पिता का साया
स्वास्थ्य विभाग की इसी निष्क्रियता का नतीजा है कि हाल ही में जिले में एक युवक की जान चली गई। ग्राम बेंदलकोना निवासी 28 वर्षीय हरप्रसाद सोनवानी के घुटने में सड़क हादसे में हल्की चोट आई थी। वह तरदा गांव में किराए के मकान में अवैध क्लिनिक चला रहे झोलाछाप डॉक्टर के पास इलाज कराने गया। फर्जी डॉक्टर ने उसके कमर में एक इंजेक्शन लगा दिया। दो दिन बाद ही इंजेक्शन वाली जगह पर गहरा नीला निशान और तेज सूजन आ गई, धीरे- धीरे इंफेक्शन पूरे शरीर में फैलने लगा। परिजन उसे 2 सितंबर को कोरबा मेडिकल कॉलेज लेकर पहुंचे, जहां इंफेक्शन की पुष्टि हुई। हालत बिगड़ने पर 9 सितंबर को रायपुर ले जाया गया, वहां भी कोई सुधार नहीं हुआ। वापस कोरबा मेडिकल कॉलेज लाया गया, जहां बीते 5 अक्टूबर को युवक की मौत हो गई। बिना डिग्री डॉक्टर के एक गलत इंजेक्शन ने दो मासूम बच्चों के सिर से पिता का साया हमेशा के लिए छीन लिया।
ठोस कार्रवाई नहीं, सिर्फ खानापूर्ति
कोरबा जिले में रजकम्मा, तरदा जैसे अनेकों बिना डिग्री के इलाज की दुकानें सजी हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग तब तक नहीं जागता जब तक किसी की जान नहीं चली जाती। किसी की मौत के बाद शासन- प्रशासन हरकत में आता है, कलेक्टर फर्जी क्लिनिकों पर कार्रवाई के निर्देश देते हैं और स्वास्थ्य विभाग एक- दो जगह ताला लगाकर अपने ही हाथों अपनी पीठ थपथपा लेता है। कुछ दिन बाद फिर वही दुकानें सज जाती हैं। सवाल यह है कि जब ऐसे मौत की दुकानें बेखौफ चल रहा है, तो क्या जिला स्वास्थ्य अधिकारी और स्वास्थ्य अमला को इसकी भनक तक नहीं? या फिर सब कुछ देखकर भी अनदेखा किया जा रहा है? जिले में फैले इन मौत के सौदागरों पर कब ठोस कार्रवाई होगी, यह बड़ा सवाल है।


