कोरबा। गेवरा परियोजना के लिए जमीन देने वाले मिलाई बाजार गांव के प्रभावित परिवारों की परेशानियां अब सिर्फ गांव की चौपाल तक सीमित नहीं रह गई हैं। मुआवजा, रोजगार और पुनर्वास से जुड़े लंबित मुद्दों को लेकर ग्रामीणों ने अब सीधे उपमुख्यमंत्री एवं कोरबा जिले के प्रभारी मंत्री अरुण साव का दरवाजा खटखटाया है। ग्रामीणों ने मांग पत्र सौंपकर विस्थापित परिवारों के हित में हस्तक्षेप और ठोस निर्णय की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना है कि 30 सितंबर 2026 को जिला कलेक्ट्रेट सभागार में हुई जिला पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन समिति (DRRC) की बैठक में उनकी समस्याएं रखी गई थीं, लेकिन अपेक्षित समाधान नहीं निकल सका। इसके बाद प्रभावित परिवारों ने अपनी मांगों को दोबारा मजबूती से सामने रखते हुए प्रभारी मंत्री से हस्तक्षेप की मांग की है।
मुआवजे में कटौती क्यों? गाइडलाइन के आधार पर भुगतान की मांग
भिलाई बाजार के प्रभावितों का सबसे बड़ा मुद्दा मुआवजे से जुड़ा हुआ है। ग्रामीणों ने मांग की है कि अधिग्रहित भूमि का मुआवजा वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए राज्य शासन द्वारा निर्धारित गाइडलाइन के अनुरूप किया जाए।
सिर्फ जमीन ही नहीं, बल्कि प्रभावित परिवारों के मकान, भवन, कुएं और अन्य परिसंपत्तियों का भी निर्धारित मापदंडों के अनुसार मूल्यांकन कर शत-प्रतिशत मुआवजा दिया जाए। इसके साथ ही नियमानुसार सॉलिसिटियम राशि का भुगतान किए जाने की मांग भी उठाई गई है।
प्रभावितों का कहना है कि जमीन चली जाने के बाद उनके पास आर्थिक सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार मुआवजा ही है। ऐसे में मूल्यांकन या भुगतान में किसी तरह की कटौती उनके लिए भविष्य में गंभीर आर्थिक संकट खड़ा कर सकती है।
जमीन गई तो रोजगार भी मिले—स्थायी नौकरी की मांग तेज
विस्थापित परिवारों के लिए दूसरा बड़ा सवाल रोजगार का है। ग्रामीणों ने मांग की है कि मिलाई बाजार के मूल निवासियों और पात्र भू-विस्थापित परिवारों को स्थायी रोजगार में प्राथमिकता दी जाए।
पात्रता तय करने के लिए सामाजिक-आर्थिक एवं जातिगत जनगणना-2011 की सर्वे सूची को आधार बनाए जाने का सुझाव दिया गया है। ग्रामीणों का तर्क है कि इससे वास्तविक प्रभावित परिवारों की पहचान कर उन्हें रोजगार का लाभ दिया जा सकता है।
इसके अलावा नौकरी के बदले राशि लेने की स्थिति में रोजगार समाप्त किए जाने से संबंधित प्रावधानों में नियमानुसार राहत देने तथा निर्धारित कटऑफ प्वाइंट से नीचे रह गए पात्र भू-विस्थापितों के मामलों पर भी पुनर्विचार करने की मांग की गई है।
बिरदा में बसाएंगे तो सुविधाएं भी देनी होंगी
पुनर्वास स्थल को लेकर भी ग्रामीणों की नाराजगी सामने आई है। एसईसीएल द्वारा प्रस्तावित बिरदा पुनर्वास स्थल को लेकर प्रभावित परिवारों ने बुनियादी सुविधाओं पर सवाल उठाए हैं।
ग्रामीणों के मुताबिक प्रस्तावित स्थल पर पहुंच मार्ग, मिट्टी और पानी जैसी आवश्यक व्यवस्थाएं पर्याप्त नहीं हैं। ऐसे में वर्षों से बसे परिवारों को यदि नए स्थान पर बसाया जाना है तो वहां सिर्फ भूखंड उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि सड़क, पानी और अन्य मूलभूत सुविधाओं से युक्त सर्वसुविधायुक्त पुनर्वास स्थल विकसित करना जरूरी है।
विस्थापितों ने आवंटित भूखंडों पर संपूर्ण स्वामित्व दिए जाने की मांग भी रखी है, ताकि पुनर्वास के बाद परिवार भविष्य को लेकर सुरक्षित महसूस कर सकें।
DRRC बैठक के बाद अब मंत्री के दरबार तक पहुंचा मामला
भिलाई बाजार के विस्थापितों की मांगों ने अब प्रशासनिक स्तर से आगे राजनीतिक और जनप्रतिनिधि स्तर पर भी दस्तक दे दी है। ग्रामीणों का कहना है कि वे विकास और परियोजना के विरोध में नहीं हैं, लेकिन विकास की कीमत प्रभावित परिवारों के अधिकारों की अनदेखी करके नहीं चुकाई जानी चाहिए।
उनकी मांग है कि मुआवजा, रोजगार और पुनर्वास से जुड़े प्रत्येक बिंदु पर प्रशासन और संबंधित परियोजना प्रबंधन स्पष्ट निर्णय लें और प्रभावित परिवारों को भरोसे में लेकर आगे की प्रक्रिया पूरी की जाए।
अब निगाहें फैसले पर
भिलाई बाजार के ग्रामीणों द्वारा प्रभारी मंत्री को मांग पत्र सौंपे जाने के बाद अब देखना होगा कि शासन-प्रशासन की ओर से इन मांगों पर क्या कदम उठाया जाता है। मुआवजे की राशि, स्थायी रोजगार और बिरदा पुनर्वास स्थल की सुविधाओं को लेकर उठे सवालों का समाधान होता है या मामला एक बार फिर बैठकों और आश्वासनों तक सीमित रह जाता है—यह आने वाला समय बताएगा।
फिलहाल, अपनी जमीन और घर छोड़ने की तैयारी कर रहे प्रभावित परिवारों की निगाहें अब प्रशासन के अगले फैसले पर टिकी हैं।





