कोरबा-अभनपुर। छत्तीसगढ़ में जंगलों की सुरक्षा और सिस्टम को ठेंगा दिखाते हुए बेशकीमती पेड़ों की तस्करी का एक बड़ा और सनसनीखेज मामला सामने आया है। ऊर्जा धानी कोरबा से करोड़ों रुपए की साल (सखुआ) की लकड़ियां पार कर सीधे रायपुर के अभनपुर स्थित हुकुमचंद शर्मा आरा मिल पहुंचा दी गईं। हैरान करने वाली बात यह है कि जब इस काले कारनामे की गूंज विभाग के ‘आला अफसरों’ के कानों तक पहुंची, तब जाकर आनन-फानन में कार्रवाई की गई और तस्करी की यह बड़ी खेप पकड़ी गई।
डिपो के बजाय सीधे तस्करों के हाथ
नियमों के मुताबिक, कटी हुई लकड़ियों को सरकारी डिपो में जमा किया जाना चाहिए था। लेकिन यहां तो खेल ही निराला था! सरकारी डिपो की आंखों में धूल झोंककर, तस्करों ने पूरी की पूरी खेप सीधे अपने कब्जे में ले ली और उसे ठिकाने लगाने के लिए रवाना कर दिया।
SECL और CSEB की जमीन से कटे सदियों पुराने पेड़
इस पूरे खेल में सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि जिन पेड़ों पर तस्करों ने कुल्हाड़ी चलाई, वे कोई आम पेड़ नहीं थे। कोरबा में CSEB (बिजली कंपनी) और SECL (कोल इंडिया) की जमीनों पर सीना ताने खड़े 100 से 200 साल पुराने धरोहर रूपी पेड़ों को बेरहमी से काट दिया गया। जिन पेड़ों ने सदियों का इतिहास देखा था, उन्हें चंद रुपयों के लालच में चंद घंटों में धराशायी कर दिया गया।
👤 मास्टरमाइंड सुनील गुप्ता का पुराना है ट्रैक रिकॉर्ड!
इस पूरे काले साम्राज्य के पीछे जिस मुख्य आरोपी का नाम सामने आ रहा है, वह है सुनील गुप्ता। जांच में यह बात भी निकलकर आ रही है कि यह कोई पहला मामला नहीं है। सुनील गुप्ता ऐसे कई मामलों में महारत हासिल कर चुका है और इलाके में बड़े पैमाने पर लकड़ी तस्करी के सिंडिकेट को ऑपरेट करता है
बड़ा सवाल: जब 100-200 साल पुराने पेड़ कट रहे थे और करोड़ों की सरकारी संपत्ति ट्रकों में लादकर जिला पार कराई जा रही थी, तब स्थानीय प्रशासन और मैदानी अमला क्या सो रहा था? या फिर इस ‘हरे सोने’ की तस्करी में नीचे से ऊपर तक की साठगांठ थी
अब देखना यह है कि विभाग के बड़े अफसरों की सख्ती के बाद इस रैकेट के असली आकाओं और सुनील गुप्ता पर क्या ठोस कानूनी शिकंजा कसता है,



