कोरबा (छत्तीसगढ़)। शहर की परचून और किराना दुकानों से गरीबों के हक का PDS चावल खुलेआम कालाबाजारी (अफरा-तफरी) की भेंट चढ़ रहा है। सरकारी राशन जो गरीब परिवारों के चूल्हे जलाने के लिए आता है, वह चंद मुनाफाखोरों की जेबें भर रहा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर चल रहा यह अवैध कारोबार आखिर किसकी मिलीभगत और किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है?
मीडिया के सवाल पर अधिकारी का गैर-जिम्मेदाराना रवैया
जब हमारी मीडिया टीम ने ज़मीनी हकीकत को उजागर करते हुए इस कालाबाजारी की जानकारी शहरी फूड इंस्पेक्टर संतोष कंवर को मौखिक में दी, तो उनका जवाब प्रशासनिक जिम्मेदारी पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
कार्रवाई करने और मौके पर टीम भेजने के बजाय फूड इंस्पेक्टर का कहना था:
”आप लोग ही गाड़ी को थाने में क्यों नहीं खड़ा करवा देते?”
एक ज़िम्मेदार प्रशासनिक पद पर बैठे अधिकारी का यह फीडबैक न केवल हैरान करने वाला है, बल्कि व्यवस्था की लाचारी को भी दर्शाता है।
बड़ा सवाल: अगर काम मीडिया को ही करना है, तो पद का क्या औचित्य?
मीडिया का काम उजागर करना है, कार्रवाई करना प्रशासन का: एक मीडिया रिपोर्टर का काम अवैध गतिविधियों को सामने लाना है, न कि कानून को अपने हाथ में लेकर गाड़ियों को जब्त कराना या थाने में खड़ा करवाना। अगर एक सक्षम अधिकारी ही अपना पल्ला झाड़ लेगा और सारा काम मीडिया पर थोप देगा, तो प्रशासन और मीडिया के बीच की मर्यादा और व्यवस्था का क्या महत्व रह जाएगा?
संरक्षण के बिना इतनी बड़ी अफरा-तफरी कैसे? किराना दुकानों तक सरकारी चावल की इस तरह बेखौफ डिलीवरी इस बात का साफ सबूत है कि यह खेल बिना विभागीय शह और साठगांठ के संभव ही नहीं है।
वीडियो में कैद हुआ कालाबाजारी का सच
सामने आए वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि किस तरह किराना दुकानों में PDS का चावल बेझिझक बेचा जा रहा है। सबूत सामने होने के बावजूद कंवर साहब का कार्रवाई से पीछे हटना और बेतुका बयान देना कहीं न कहीं मिलीभगत की ओर ही इशारा करता है।
कड़ा संदेश एवं मांग:
गरीबों के निवाले पर डाका डालने वाला यह अवैध कारोबार कब रुकेगा? क्या ज़िला प्रशासन और उच्च अधिकारी इस मामले का संज्ञान लेंगे, या फिर यह कालाबाजारी ऐसे ही प्रशासनिक ढुलमूल रवैये के साए में फलती-फूलती रहेगी?
यह खबर केवल एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि ज़िला कलेक्टर और खाद्य विभाग के उच्च अधिकारियों के लिए एक खुली चुनौती है—
शहरी फूड इंस्पेक्टर के इस गैर-जिम्मेदाराना बयान पर तुरंत स्पष्टीकरण मांगा जाए।
वीडियो साक्ष्यों के आधार पर संबंधित किराना दुकानों और गाड़ियों पर तत्काल छापामार कार्रवाई कर FIR दर्ज की जाए।
इस पूरे रैकेट में शामिल विभागीय अधिकारियों और कालाबाजारियों की साठगांठ की निष्पक्ष जांच हो।





