23 अक्टूबर को शाहदरा थाने में वकील ललित बंसल और पुलिसकर्मियों के बीच विवाद हुआ। आरोप लगा कि ACP मनस्वी वशिष्ठ ने गुस्से में अपनी रिवॉल्वर निकाल ली। इसके बाद वकीलों ने मोर्चा खोल दिया और धरने पर बैठ गए।
28 अक्टूबर को ACP मनस्वी वशिष्ठ और SHO शाहदरा का ट्रांसफर हुआ, जिसके बाद वकीलों ने अपना धरना खत्म कर दिया।
लेकिन कहानी में ट्विस्ट तब आया जब ACP साहब अपने करीब 150 पुलिस जवानों के साथ दिल्ली पुलिस मुख्यालय पहुंच गए और ट्रांसफर के विरोध में धरने पर बैठ गए।
अब इस पूरे मामले में गृह मंत्रालय ने ऐसा फैसला लिया कि धरने पर बैठे ACP मनस्वी वशिष्ठ को ही सस्पेंड कर दिया गया।
यानी जिस ट्रांसफर को रुकवाने के लिए इतनी बड़ी ताकत के साथ प्रदर्शन करने पहुंचे थे, मामला उससे भी आगे निकल गया!
अब सवाल यह है कि क्या किसी अधिकारी को अपने ट्रांसफर के खिलाफ इस तरह अपने साथियों के साथ प्रदर्शन करना चाहिए या फिर विभागीय अनुशासन सबसे ऊपर होना चाहिए?
आपकी नजर में गृह मंत्रालय का फैसला सही है या ACP के साथ नाइंसाफी हुई है? अपनी राय जरूर बताइए।



