जांजगीर/चांपा। शहर में अवैध पटाखों की बिक्री और भंडारण का मामला आम लोगों की सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। जांजगीर और चांपा के विभिन्न इलाकों में बिना जरूरी अनुमति पटाखों की बिक्री और भंडारण किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। गली-मोहल्लों और रिहायशी बस्तियों में यदि विस्फोटक सामग्री का असुरक्षित तरीके से भंडारण हो रहा है, तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि आसपास रहने वाले परिवारों की जान को जोखिम में डालने जैसा है।
त्योहारी कारोबार की आड़ में यदि प्रतिबंधित या बिना लाइसेंस पटाखों की खरीद-बिक्री हो रही है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह कारोबार किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है? क्या संबंधित कारोबारियों को कानून का कोई भय नहीं है, या फिर जिम्मेदार विभागों की निगरानी व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित रह गई है?
लाइसेंस और सुरक्षा मानकों की जांच कौन करेगा?
पटाखों के कारोबार को लेकर नियम बिल्कुल स्पष्ट हैं। विस्फोटक नियम, 2008 के नियम 83 और 88 के अनुसार पटाखों की बिक्री केवल लाइसेंस प्राप्त परिसर से ही की जा सकती है। दुकान की संरचना, सुरक्षा व्यवस्था, भंडारण और अग्निशमन पहुंच के संबंध में भी निर्धारित शर्तें हैं। यानी कोई भी व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुसार रिहायशी मकान, दुकान या गली-मोहल्ले में पटाखों का भंडारण कर बिक्री नहीं कर सकता। इसके बावजूद जांजगीर और चांपा में यदि बिना अनुज्ञप्ति पटाखों की बिक्री और असुरक्षित भंडारण हो रहा है, तो यह संबंधित विभागों की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। पुलिस का काम केवल घटना घटने के बाद अपराध दर्ज करना नहीं, बल्कि संभावित खतरे को समय रहते रोकना भी है।
पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी से बचने का रास्ता नहीं
सबसे बड़ा सवाल जांजगीर और चांपा पुलिस से है। क्या दोनों शहरों के थाना प्रभारियों को अपने-अपने क्षेत्रों में पटाखों की बिक्री और भंडारण की जानकारी नहीं है? क्या पुलिस ने अब तक संदिग्ध दुकानों और गोदामों की जांच की है? कितने कारोबारियों के पास वैध लाइसेंस हैं? कितने स्थानों पर भंडारण की अनुमति है? और क्या निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन किया जा रहा है? वहीं जिला प्रशासन, राजस्व विभाग, नगर पालिका और अग्निशमन विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आखिर त्योहारों के दौरान संभावित विस्फोटक खतरे को लेकर नियमित निरीक्षण क्यों नहीं दिखाई दे रहा? यदि किसी रिहायशी इलाके में आग या विस्फोट की घटना हो जाती है और उसकी चपेट में आसपास के घर, दुकानें या राहगीर आ जाते हैं, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?
हादसे के बाद जागने की परंपरा कब बदलेगा प्रशासन?
पटाखों का अवैध कारोबार केवल सरकारी राजस्व को नुकसान पहुंचाने का मामला नहीं है। यह सीधे आम नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ा विषय है। एक छोटी सी चिंगारी असुरक्षित तरीके से रखे पटाखों के बड़े जखीरे को विस्फोट में बदल सकती है। ऐसे में प्रशासन की निष्क्रियता को सामान्य लापरवाही मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जिला प्रशासन को तत्काल जांजगीर और चांपा के रिहायशी इलाकों, संदिग्ध दुकानों और संभावित भंडारण स्थलों की संयुक्त जांच करानी चाहिए। बिना वैध लाइसेंस कारोबार करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर पटाखों की जब्ती सहित वैधानिक कार्रवाई की जानी चाहिए।
सवाल सीधा है—क्या जांजगीर और चांपा प्रशासन किसी बड़ी दुर्घटना के बाद जागेगा, या उससे पहले ही आम लोगों की सुरक्षा के लिए अपनी जिम्मेदारी निभाएगा?
शहर के नागरिकों को पटाखों के कारोबार से किसी को आपत्ति नहीं है, लेकिन कारोबार की आड़ में उनकी जान जोखिम में डालने का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता। कानून का पालन कारोबारियों को भी करना होगा और कानून का पालन करवाने की जिम्मेदारी निभानी पुलिस एवं प्रशासन को होगी।


